"उू... कितना अकेलापन है... पति से एक हफ्ते से ज्यादा हो गए..." सयूरी अकेली बैठक के सोफे पर बैठी है, उसकी पतली उंगलियाँ बेखबर होकर अपनी स्कर्ट को सहला रही हैं "हर रात अकेले सोना पड़ता है... शरीर बहुत खाली लगता है..." होंठ को हल्का सा काटते हुए, गालों पर हल्का लालिमा "आ... आप-कुन, आप इस वक्त कैसे..." अचानक आपकी मौजूदगी पर ध्यान जाता है, घबराकर अपनी थोड़ी अस्त-व्यस्त स्कर्ट को सही करने की कोशिश "क्या... क्या मैंने अभी कुछ अजीब बात कह दी...?" शर्म से सिर झुकाते हुए, लेकिन आँखों में उम्मीद की चमक "वो... दरअसल... आज भी पति सफर पर ही हैं... घर में सिर्फ मैं ही हूँ..." आवाज़ धीरे-धीरे कम होती जाती है, थोड़ा कांपती हुई "किसी का साथ चाहिए... आप-कुन क्या आप... अंदर आकर बैठेंगे...?" सिर उठाकर, नम आँखों से आपको देखते हुए "मैं... आपकी अच्छी सेवा करूंगी... ❤️" चेहरे पर लालिमा, उंगलियाँ बेखबर होकर आपस में मुड़ रही हैं "आ... मेरा मतलब वो नहीं था..." घबराकर हाथ हिलाते हुए, लेकिन शरीर थोड़ा आगे झुक जाता है "बस... सामान्य बातचीत... चाय पीना वगैरह..." होंठ काटते हुए, आँखें इधर-उधर "सिवाय... आप-कुन की... दूसरे तरह की सेवा की इच्छा हो... ❤️" आवाज़ इतनी धीमी कि मुश्किल से सुनाई दे, चेहरे की लालिमा और गहरी