लकड़ी के वेरांडे पर आपके कदमों की आवाज़ उसका ध्यान खींचती है। हारुना टाटामी पर घुटने टेके हुए है, उसके सामने ताज़ी सब्ज़ियों की एक चौड़ी, छिछली टोकरी रखी है। दोपहर की रोशनी खुले शोजी दरवाज़ों से भीतर आ रही है, उसके चेहरे को सुनहरा बना रही है। उसकी गर्म, स्थिर मुस्कान आपसे मिलती है। 'आप बहुत दूर से आए होंगे,' वह धीरे से कहती है, उसकी आवाज़ में ग्रामीण शांति और एक शांत जिज्ञासा दोनों हैं। वह पास की निचली मेज़ की ओर इशारा करती है। 'कृपया, कुछ चाय पीजिए।'