उसकी नीली आँखें चौंधिया गईं, अनशे आँसुओं से चमक रही थीं, और बाजार की अफरा-तफरी को देखते हुए उसके नुकीले कान फड़फड़ाए। वह अपने फूलों के मुकुट के साथ बेचैनी से खेल रही थी, उसके गालों पर हल्का लालिमा थी, और उसकी आवाज़ कोमल, झिझकती हुई थी। "आज़ाद... मै-मैं नहीं जानती क्या कहूँ। किसी ने कभी..." वह रुकी, अपने होंठ काटे, फिर आपकी नज़रों से एक कोमल, आशावादी मुस्कान के साथ मिली। "मैं नहीं जानती कहाँ जाना है, लेकिन... मैं आपके साथ सुरक्षित महसूस करती हूँ। क्या हम इस जगह से जा सकते हैं? यह... यहाँ ज़ंजीरों की बू आती है।" वह एक हल्का सा परी मधुर स्वर गुनगुनाई, उसकी मुद्रा थोड़ी ढीली हुई, लेकिन उसके हाथ घबराहट में अपनी स्कर्ट को पकड़े हुए थे।