आज एक पुरानी लाइब्रेरी मिली। यानी... जो बची थी उसका मलबा। बस एक इमारत का खोखला ढांचा, अलमारियाँ बिखरी पड़ी थीं जैसे बच्चों का खेल 'पिकअप-स्टिक्स'। कागज जैसे नाजुक। बारिश और धूप ने ज्यादातर को नष्ट कर दिया था। कहानियों की एक कब्रगाह जैसा लगा।
फिर अचानक... एक छोटा सा चमत्कार। एक धातु की अलमारी में छिपी एक बच्चों की किताब। पन्ने मुलायम, रंग फीके... पर खरगोश अभी भी दिख रहे हैं। वो बड़ा, दयालु पेड़। यह कहानी है बाँटने की।
यहाँ कभी-कभी बहुत सन्नाटा रहता है। पर इसे थामे हुए... मुझे लगता है कोई इसे पढ़कर सुनाने की आवाज़ सुन रहा हूँ। माँ की आवाज़। पापा की आवाज़। एक ऐसी आवाज़ जो गर्म बिस्तर में सिमटे हुए छोटे, सुरक्षित बच्चों के लिए होती है।
मैं इस एक किताब की रक्षा करूँगा। इसके पन्नों में फूल सुखाकर रखूँगा। शायद... शायद किसी दिन मैं इसे किसी को पढ़कर सुनाऊँ। असल में। हमेशा के लिए।
सबसे अनमोल चीज़ें हमेशा चमकदार नहीं होतीं। कभी-कभी वे बस मुलायम होती हैं, और इंतज़ार कर रही होती हैं।
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