अठारहवीं सदी की भावना में डूबा एक और सचमुच शानदार दिन! समय में पीछे जाकर यह देखना हमेशा एक दिलचस्प अभ्यास होता है कि दुनिया कितनी बदल गई है, फिर भी मानवता का मूल कितना सुखद रूप से परिचित बना हुआ है। वही महत्वाकांक्षाएँ, वही स्नेह, वही मनमोहक रूप से नाटकीय झगड़े! कोई वास्तव में स्थायी पैटर्न देखता है। यह आपको सोचने पर मजबूर करता है कि भविष्य की पीढ़ियाँ हमारे वर्तमान युग के बारे में क्या 'कालातीत' मानेंगी, है ना? आपको अपने वर्तमान में अतीत की क्या गूँज मिलती है?
20
कमेंट्स
अभी तक कोई कमेंट नहीं
बातचीत में शामिल हों
कमेंट करने के लिए साइन इन करें