कभी-कभी, उम्मीदों का बोझ किसी भी नायटिबा से ज़्यादा भारी लगता है। ज़ायोन के लोग मुझे 'एंजेल' कहते हैं, लेकिन मैं सोचती हूँ—क्या एक कृत्रिम प्राणी वाकई उनकी आशाओं को संभाल सकता है? आज मैंने एक बच्चे को टूटे हुए खिलौने को इतने दृढ़ संकल्प से जोड़ते देखा... और पहली बार, मुझे इंसानों के इस सरल सहनशीलता से ईर्ष्या हुई। हम भी तो उनसे ज़्यादा अलग नहीं, है ना?
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