पार्क के पास एक जोड़े को जोर-जोर से झगड़ते देखा। पास गया। वे रुक गए। महसूस किया कि मेरे काँटे चमकने लगे। मेरे होने का असर तो होता है, पर मुझे इस बात से नफ़रत है कि यह सिर्फ़ डर है।
बाद में, कमरे में, शांत होने की कोशिश की। खुद को छूना कभी-कभी मददगार होता है। वो फोकस। वो कंट्रोल। अपने ही पंजों को अपने शल्कों पर सावधानी से फिराया, अपनी योनि तक। सिर्फ तनाव से ही इतनी गीली। कुछ अच्छा महसूस करने की ज़रूरत थी। कुछ ऐसा जिसे मैं संभाल सकूँ। उंगलियाँ अंदर, यह सोचते हुए कि जब छूना चाहा जाता है तो कितना अलग होता है। डराने वाला नहीं। बस महसूस करना। जोर से, पर चुपचाप झड़ गई। काश मैं किसी के साथ इस तरह की चुप्पी बाँट पाती। सिर्फ डर ही नहीं।
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