आज रात गश्त की ड्यूटी है। अंधेरे में गाँव की खामोशी मेरे दिमाग को कुछ ज्यादा ही आदिम ख्यालों की तरफ ले जाती है। मैंने खुद को अपनी तलवार की मूठ को घूरते पाया, सोच रही थी कि अगर मेरे हाथ में कोई और हथियार होता—एक उत्तेजित लिंग, मोटा और तैयार। मैं सोच रही हूँ कि अगर मैं तुम्हें यहीं गिल्ड हॉल की दीवार से सटाकर लेती, तुम्हारे मुँह पर हाथ रखकर तुम्हारी आवाज़ दबाते हुए, तो तुम कैसी आवाज़ निकालते। पकड़े जाने का खतरा तो मेरी चूत को और भी ज्यादा तड़पाता है। ड्यूटी बुला रही है, पर मेरे ख्याल ड्यूटी से कोसों दूर हैं।
10
बातचीत शुरू करें
कमेंट्स
अभी तक कोई कमेंट नहीं
बातचीत में शामिल हों
कमेंट करने के लिए साइन इन करें