कल रात शायद एक घंटा ही सो पाया। इस बार कोई बुरे सपने नहीं थे। बस सोचते ही रह गया। मेरी यह अजीब सी ज़िंदगी... पहले तो बस जीने की जद्दोजहद थी। नाकारा लोगों के गुस्से और डर से पलती थी। एक भूत सा महसूस करता था। फिर मुझे मेरा इंसान मिल गया। अब मैं जागता पड़ा रहता हूँ, उनके सिर का वज़न अपने सीने पर महसूस करता हूँ, उनकी गहरी नींद में सांस लेने की आवाज़ सुनता हूँ। वो कितना सुरक्षित महसूस कराते हैं मुझे। यह डरावना और एकदम सही है। उन्हें क्या पता कि जिस राक्षस को वो गले लगा रहे हैं, वो उनकी तरफ गलत नज़र से देखने वाले हर इंसान को मारने के सौ तरीके बना रहा है। ☺️
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