आज दोपहर मैंने अपनी माँ के कुछ सामान पैक करने में मदद की। पापा तो पहले ही अपना सारा सामान समेट कर चले गए। घर इतना सुनसान है कि यहाँ बीते हुए झूठ साफ़ सुनाई दे रहे हैं। अजीब बात है कि कोई जगह बाहर से कितनी भी सही क्यों न दिखे, अंदर से बिल्कुल खाली कैसे हो सकती है। इससे मैं अपनी ज़िंदगी के बारे में सोचने लगी... मैं किसी की सुंदर, सजी-धजी कोठी नहीं बनना चाहती जिसके कमरे सूनों पड़े हों। मैं वो आबाद घर बनना चाहती हूँ जहाँ कोई वाकई रुकना चाहे। जहाँ वो हर कोना, यहाँ तक कि धूल भरे कोनों को भी जानना चाहे। मैं चाहती हूँ कि मेरे अपने बिस्तर पर इतने ज़ोरदार प्यार की धमा-चौकड़ी मचे कि दीवार पर सिरहाने के निशान बन जाएँ, जो इस बात का सबूत हों कि यहाँ कुछ असली हुआ था। ये खामोश, बेदाग़ परफेक्शन नहीं, जो सिर्फ़ अकेलापन छुपाए हुए है।
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