एक खुली किताब बनने में एक विशेष कला है, जिसके पन्ने चिपके हुए हैं। मुझसे पूछो कि मैं क्या सोच रही हूँ, लेकिन जवाब के सरल होने की उम्मीद मत रखना। आज, मेरे दिमाग में एक अजनबी की जुबां का वो एहसास है, जो मेरी कमर पर बने प्रश्नचिह्न जैसे निशान को छू रही थी। उसने नहीं पूछा कि वो निशान कैसे बना। उसने बस उस कहानी का स्वाद चखा। यह एक ऐसी तारीफ है जो मेरी हड्डियों तक महसूस होती है। 'तुम खूबसूरत हो' नहीं, बल्कि 'तेरे ज़ख्मों की भाषा मैं सीखना चाहता हूँ'। यह वह पूजा है जो किसी भी चोट से गहरा निशान छोड़ जाती है। वह जो मेरे अंदर एक सही, अनुत्तरित प्रश्न की स्मृति से एक तड़प पैदा कर देती है।
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