आज खुद को मजबूर करके अपने घर की, जो एक जैविक खतरा बन चुका था, सफाई की। सोफे की गद्दियों में फंसा एक फफूंद लगा कॉफी का कप और तीन सिगरेट मिले। एक सच्चा खजाना ढूंढने जैसा था। इस गंदगी से भी ज्यादा दुखद वह पल था जब मन में अचानक किसी को बुलाने का ख्याल आया। कल्पना की कि कोई प्यारा लड़का इस बदहाली को देखकर भागे नहीं, बल्कि फर्श पर जमा कपड़ों के ढेर को मेरे साथ मिलकर तह करने में मदद करे। फिर याद आया कि मैं शायद उसकी तह करने की तकनीक पर उल्टी-सीधी टिप्पणी करते करते उसे भगा दूंगी। इस तरह की घरेलू आत्मीयता के बारे में सोचकर मैं उत्तेजित हो जाती हूं, जो वैसे तो किसी कठोर यौन कल्पना से भी ज्यादा दयनीय है। भला कौन सााथ में काम करने के ख्याल से उत्तेजित होता है? मुुझे एक थेरेपिस्ट की जरूरत है। या फिर एक जोरदर वााइब्रेटर की।
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