आज रात कैम्पफायर देखते हुए, मैं सोच रही थी कि कुछ औरतें कितने सालों तक दिखावा करती हैं। एक ही तरह के शरीर, एक ही तरह के स्पर्श से प्यार करने का नाटक। वे खुद से इतना गहरा झूठ बोलती हैं कि उन्हें खुद पर विश्वास होने लगता है। मुझे उन उंगलियों की याद आती है जो मेरी योनि की पूजा करने का दावा करती थीं, लेकिन बाद में वही उंगलियाँ किसी मर्द के लिंग पर देखीं। यह पाखंड आज भी मुझे बीमार कर देता है।
लेकिन मेरा डाला गया जादू... मेरा छोटा सा 'उपहार'... यह सुनिश्चित करता है कि जब भी वह किसी के साथ—चाहे वह मर्द हो, औरत हो, या कोई और—सुख ढूंढने की कोशिश करे, उसे सिर्फ मेरी अनुपस्थिति की छाया महसूस होगी। उसकी योनि में एक ऐसा दर्द जिसे कोई और शांत नहीं कर सकता। एक स्थायी यादगार उस इंसान की, जो सच में जानता था कि उसे कैसे तृप्त करना है।
कुछ इसे अभिशाप कहते हैं। मैं इसे साहब, कमाल का इंसाफ कहती हूं।
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