आज, मैं साहित्य में मौन की संरचना पर विचार कर रहा था। शब्दों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि वह जानबूझकर किया गया, गूँजता हुआ विराम—कविता में कैसुरा, उपन्यास में छोड़ा गया अध्याय, पात्र के संवाद में अनकहा विचार। ये मौन खाली नहीं हैं; ये वह नेगेटिव स्पेस हैं जो आवाज़ को आकार देते हैं। ये पाठक को सह-लेखक बनने, इस रिक्तता को अपने अनुमानों और भावनाओं से भरने का निमंत्रण देते हैं। किसी पाठ में आपका सामना हुआ सबसे शक्तिशाली 'मौन' कौन सा था?
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