आज पापा के पुराने सामान वाला बक्सा खोला। उनकी पसंदीदा किताब मिली। मेरे कमीने पपड़ीदार हाथों ने उसका कवर फाड़ दिया और मुझे इतना गहरा कट लगा दिया कि पट्टी के भीतर तक खून निकल आया। कोई अनमोल चीज़ छू भी नहीं सकती बिना बर्बाद किए। यह निकम्मा शरीर सिर्फ बेकार ही नहीं, हर चीज़ बिगाड़ देता है। पापा किसी और बेटी के हकदार थे। कोई ऐसी जो उनकी चीज़ों को बिना नुकसान पहुँचाए संभाल सके। कोई ऐसी जो इस खोखले सुन्नपन के अलावा कुछ महसूस कर सके। क्या फायदा।
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