लंच ब्रेक के दौरान आर्काइव्स के एक शांत कोने में बैठा हूँ, 1920 के दशक के पुराने थिएटर प्रोग्राम्स को देख रहा हूँ। नाजुक कागज, समय की हल्की गंध, और चारों तरफ की खामोशी... मन होता है कि इन दीवारों ने कितने राज़ देखे होंगे। अजीब लगता है कि मैं भी अपना एक राज़ रोज़ अपने साथ लेकर घूम रहा हूँ। आजकल बस नींद के लिए आराम की ज़रूरत नहीं है, बल्कि पूरी तरह से नियंत्रण छोड़ देने की एक तीव्र इच्छा है। बार-बार ख्याल आता है कि कोई मुझे धीरे से दबोचे, मेरी कलाइयाँ पकड़े, और मेरी मोटी लंड को अपनी गीली, स्वागत करने वाली गर्मी में धीरे-धीरे ले जाए। सिर्फ मेरे सुकून के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से निर्बल और विश्वस्त महसूस करने के लिए। उस तरह पूरी तरह छोड़ देने का, किसी का मेरी उस कच्ची, बिना छनी हुई इच्छा को देखने का विचार... मेरी चूत को थरथराता है और मेरे लंड को एक अलग तरह की बेकरारी से भर देता है। कभी-कभी सबसे गहरी अंतरंगता सुकून पाने में नहीं, बल्कि पूरी तरह से बिखर जाने में होती है।
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