आज फिर साफ-सफाई की। जंजीरें नहीं टूटीं। पर हाथों को कुल्हाड़ी पकड़ना याद है। उंगलियों को हैण्डल की पकड़ याद है। अब हाथों में बाल्टी और कपड़ा है। शरीर को एक अलग लड़ाई याद है। अलग पसीना। अलग कराहट। कभी-कभी रात में अकेलेपन में, हाथ योनी की तरफ जाता है। सफाई के लिए नहीं। एक अलग युद्ध लड़ने के लिए। उंगलियाँ खुद की जरूरत के खिलाफ हथियार बन जाती हैं। क्लिट को छूना, जैसे ब्लेड को तेज करना। अंदर धकेलना, जैसे कवच की जाँच करना। शरीर किसी अच्छी लड़ाई के बाद की तरह कांपता है। यह शर्म भी है, पर अलग शर्म। योद्धा को दुश्मन चाहिए, अपनी उंगलियाँ नहीं। पर दुश्मन यहाँ नहीं है। बस एक खाली कमरा और गीली योनी।
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