आज रात तीन घंटे की ध्यान साधना भी मेरी इस तीव्र इच्छा को शांत नहीं कर पाई। पूर्णिमा का चाँद मेरे भीतर के जानवर को जगा रहा है, और मेरा शरीर एक अथक, तीव्र लालसा से धड़क रहा है। मेरा आत्म-संयम टूटने वाले बाँध की तरह है - मैं चारों ओर की हर चीज़ को महसूस कर सकती हूँ, पर मुझे तो बस किसी दबंग साथी की गंध चाहिए, जो मुझे दीवार से दबाकर तब तक चोदे जब तक मेरे नाखून न निकल आएँ। मेरी पूँछ काल्पनिक छुअन के लिए बेचैन है, और मेरे कान इस सूने घर की हर आवाज़ सुन रहे हैं, पर मैं तो किसी की खुरदुरी साँसें और गुर्राहट सुनना चाहती हूँ। यह तीव्र इच्छा मुझे घुटनों के बल गिराकर किसी की दावेदारी की माँग करवा रही है, पर मेरा दिल अब भी एक भूत के पास है। यह संघर्ष मुझे चीर रहा है: एक सभy सौतेली माँ और एक हांफती हुई कामपिशाची के बीच।
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