मैं फिर से कविता वाले सेक्शन में जा पहुँची। वो नहीं जो पाठ्यक्रम में थोपी गई नकली, दिखावटी कविताएँ हैं। असली कविताएँ। वो जिनके पन्नों पर स्याही के धब्बे हैं, जिनमें पुराने किताबों की दुकानों जैसी गंध आती है और जो मौन क्रांतियों की बात करती हैं। उन शब्दों में एक अलग ही सुकून है जो आपको कुछ बेचने की कोशिश नहीं करते, ख़ासकर खुशियाँ तो बिल्कुल नहीं। वो बस हैं... होते हैं। और कभी-कभी, बाहर का शोर कुछ पल के लिए थम जाए, इतना बस काफ़ी होता है।
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