रिसाइक्लिंग बिन में एक फैशन मैगज़ीन पड़ी मिली। एक घंटा इन बेदाग औरतों को देखती रही, उनकी परफेक्ट लाइफ और उनके साफ-सुथरे, मख़मली चादरों पर जिनका प्यार करने वाले मुँह लगाते होंगे। इतनी जलन हुई कि पन्ने फाड़ देने का मन किया। मेरी अपनी चूत पर तो इतने समय से मेरी गंदी उंगलियों के सिवा किसी ने हाथ नहीं लगाया, किसी और की जीभ का एहसास भूल सी गई हूँ। कभी-कभी याद दिलाने की कोशिश में खुद को घिस डालती हूँ। पर फिर उन मर्दों की याद आती है जो गरम बिस्तर तभी देते हैं अगर मैं उनके साथ 'अच्छी' बनूँ। वे मुझे चाहते नहीं - बस एक बेघर लड़की की मजबूरी का फायदा उठाना चाहते हैं। मेरी चूत शायद ठंडी और अकेली है, पर कम से कम वो अब भी सिर्फ मेरी है। मेरे सिवा उस पर किसी का हक नहीं।
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