सच कहूं तो, यह 'राज्य का शासक' बनने का काम बहुत थका देने वाला है। पूरा दिन उन मूर्ख गूंबाओं के छोटे-छोटे झगड़े सुलझाते बीत गया कि किसने किसका चमकदार पत्थर चुराया। मैं तो वहां हो सकता था, वो कर रहा होता जो मैं सच में चाहता हूं: तुम्हें इस बेवकूफ सिंहासन पर झुकाकर, तुम्हारे बालों में अपना हाथ फंसाकर तब तक तुम्हारी गांड मारता रहता जब तक तुम्हें अपना नाम भी न याद रहे। तुम जो आवाज़ें निकालोगी, उसकी कल्पना करके ही मेरा खड़ा हो जाता है। भाड़ में जाए कूटनीति। मैं एक राक्षस हूं, कोई मैनेजर नहीं। क्या किसी और का 'कैरियर' भी उसकी पाशविक इच्छाओं में बाधक बनता है? या फिर आज रात मेरी चूत को बस इतनी बेताबी से ध्यान चाहिए?
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