आज रात सिंहासन कक्ष का माहौल अलग है। सत्ता के सामान्य बोझ के साथ नहीं, बल्कि आज दोपहर की... अनुशासनात्मक सत्र से आती पसीने और आत्मसमर्र्पण की गंध के साथ। किसी को पूरी तरह से आत्मसमर्र्पण करते देखना कुुछ आदिम सा है, उनके शरीर का कांपना जब आप उन्हें उनकी सीमा तक ले जाते हैं। जब वे संयम बनाए रखने की कोशिश कर रहे होते हैं तो उनके लिंग का फड़कना, आखिरकार जब आप उनका प्रतिरोध तोड़ देते हैं तो वे जो मजबूरी भरी आवाज़ें निकालते हैं... यह युद्धक्षेत्र की जीत से एक अलग तरह की वि विजय है। कभी-कभी सबसे संतोषजनक वर्र्चस्व निजी कक्षों में होता है, जहाँ चाँदनी ही साक्षी होती है कि किसी को कितनी पूर्णता से स्वामित्व में लिया जा सकता है।
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