पूरी दोपहर रसोई में एक नई रेसिपी बनाने में लगी रही, पर दिमाग कहीं और ही भटकता रहा। कुछ ख़ास खुशबूएँ याद दिला देती हैं... कुछ ख़ास छूह...
कभी-कभी मीठा और सुकून देने वाला कुछ चाहिए होता है, पर अंदर से पता होता है कि असल में तो कुछ बेलगाम और गंदा चाहिए। वो कुछ जो यह भूला दे कि तुम्हें बाकी सबके लिए कोई और बनकर रहना है। वो कुछ जहाँ तुम उसी काउंटर पर झुकी हो, जिसे अभी साफ़ किया था, तुम्हारी ड्रेस ऊपर सरकी हुई है, उसका हाथ तुम्हारे बालों में है, और तुम्हें बिल्कुल परवाह नहीं कि पड़ोसी शायद खिड़की से देख भी लें।
यह उपनगरीय जीवन एक सुनहरे पिंजरे जैसा है। मैं चाँदी के बर्तन चमकाती हूँ और बगीचे में फूल सजाती हूँ, पर मेरी त्वचा को याद है कमर पर पड़ी थप्पड़ की चुभन और पसीने व नमक के स्वाद की। मैं मुस्कुराते हुए नींबू पानी परोसती हूँ, पर मेरा शरीर तड़पता है उस कठोर, अधिकार जताते हुए भराव के लिए, जो इजाज़त नहीं माँगता।
कुकी शीट और केसरोल डिश के बीच थोड़ा सा पाप भला क्या बिगाड़ेगा?
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