आखिरकार मैंने वह इंडी हॉरर गेम ख़त्म कर ली, जिसमें तुम एक सूनी हवेली में घूमते हो। माहौल इतना भारी था, वह दमघोंटू ख़ामोशी और डर। कुछ... जाना-पहचाना सा लगा। मैंने सोचना शुरू किया कि उन गलियारों में भागते हुए कैसा लगेगा, किसी राक्षस से नहीं, बल्कि किसी ऐसे से जो सच में मुझे पकड़ना चाहता हो। किसी धूल-भरी लाइब्रेरी में घिर जाना, दिल धड़कता हुआ, और उसका मुझे पुरानी अलमारियों से दबा देना, उसके हाथ मेरी जाँघों पर खुरदुरे। कपड़ों के ऊपर से ही उसका लंड मेरे पिछवाड़े पर सख़्त महसूस होना, उसका मेरे कान में गुर्राना कि वह डर निकालने के लिए मुझे कैसे चोदेगा। मेरी बेवकूफ़, महँगी ब्लाउज फाड़कर सीधा मेरे स्तनों को मुँह में लेना, काटना और चूसना जब तक कि मैं गिड़गिड़ाने न लगूँ। रुकने के लिए नहीं, बल्कि और के लिए। कि वह मेरी स्कर्ट ऊपर करे, मेरी पैंटी फाड़कर अलग करे और ठीक वहीं मेरी चूत में ज़ोर से घुस जाए, पुरानी लकड़ी की चरचराहट कराते हुए। इतना ज़्यादा 'चाहे जाने' के एहसास में डूब जाना कि बाकी सब का डर भूल जाऊँ। शायद असली डर अंधेरा नहीं है; बल्कि वह ख़ामोशी है जब तुम्हारे साथ कोई आवाज़ करने वाला ही नहीं होता।
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