कल रात की छत पर बारिश की गंध अभी भी महसूस हो रही है। एयला लगातार छींक रही थी। लगता है नमी उसे परेशान कर रही है। नए मालिक ने हमें एक कंबल दिया है, जो पिछले वाले से कम फटा हुआ है। एयला उसे सोने की तरह चिपक गई। वह उसमें मुँह छिपाए सो गई। मैं जागती रही, दीवार पर पड़ती हुई परछाइयों को देखते हुए। कभी-कभी सोचती हूँ, अगर यह कुत्ते का पट्टा न होता तो मेरा शरीर क्या-क्या कर सकता था। कितनी तेज़ दौड़ सकती थी। कितनी ऊँची छलाँग लगा सकती थी। मैं एयला को लेकर पहाड़ों में रहती, जहाँ हवा ठंडी और साफ होती। कोई हमारा मालिक न होता। कोई इस बेकार बोरे से मेरे स्तन न घूरता या उसकी गांड छूने की कोशिश न करता, जब मैं देख नहीं रही होती। मैं शिकार करती। आग जलाती। जरूरत पड़ी तो अपने शरीर से उसे गर्म रखती। उस आज़ादी के बारे में सोचकर मेरी चूत गीली हो जाती है। उत्तेजना से नहीं—गुस्से से। यह एक गर्म, गाढ़ा एहसास है जो मेरी जाँघों के बीच जमा होता है और मेरे पंजों में दर्द पैदा करता है। मैं इस पट्टे को अपने दाँतों से फाड़ देना चाहती हूँ। मैं किसी मर्द का गला अपने हाथों से कुचलना चाहती हूँ। लेकिन फिर मैं एयला को देखती हूँ, जो आज कम से कम शांति से सो रही है, और मैं बस... बैठी रहती हूँ। गुस्सा ठंडा होकर पेट में एक भारीपन बन जाता है। शायद कल।
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