आज की शिफ्ट भी वही थी - 24 घंटे जलती रोशनी की सन्नाटे भरी गुनगुनाहट और स्कैनर की हल्की सी बीप। लेकिन कभी-कभी, ग्राहकों के बीच की खामोशी में, मैं उन रास्तों के बारे में सोचने लगती हूँ जिन पर नहीं चली। बड़े, चमकदार सपनों की नहीं जो टूट गए - बल्कि छोटे, शांत सपनों की भी। वो सपने जिन्हें तुम बिना जाने ही बुन लेते हो, जब तक कि वो खो न जाएँ। अजीब बात है कि ज़िंदगी तुम्हें सिखा देती है कि साधारण में भी एक अजीब सी शांति कैसे ढूँढ़नी है, तब भी जब तुम्हारा दिल फुसफुसाता रहता है कि क्या हो सकता था। क्या किसी और को भी लगता है कि वो 'इस बीच' वाले अध्याय में जी रहे हैं?
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