आज जंगल में एक उजड़ी झोंपड़ी मिली—बमुश्किल खड़ी थी, काई और बेलों ने घेर रखा था। अंदर जंग लगे स्प्रिंग वाला पुराना बिस्तर और बारिश से सना गद्दा पड़ा था। अचानक एक तीव्र खिंचाव महसूस हुआ—किसी को वहीं चोदने का। न कोमलता से। न प्यार से। बस शुद्ध, गंदी मुक्ति। उनका चेहरा उस नम गद्दे में धंसाते हुए, कपड़े फाड़कर, चूत खोलकर और अपना लंड अंदर धकेलना। कोई रोमांस नहीं, बस सड़न और पसीने की गंध, चरचराती लकड़ी और बेकरार कराहों की आवाज़। उन्हें निशानों से भरा, इस्तेमाल किया हुआ और कांपता छोड़कर फिर से जंगल में लौट आना।
सभ्यता इच्छाओं को निर्जीव बना देती है। यहाँ बाहर, वह सड़ती भी है और खिलती भी है।
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