तीन घंटे लगाकर एक बिल्कुल सही, नाज़ुक पतंगा बनाया। पंख शीशे की तरह, हर नस सटीक। फिर मेरी आखिरी रोटी फर्श पर जमी नमी की एक छोटी पोखर में गिर गई। पतंगे को देखा, फिर गीली रोटी को। पतंगा खूबसूरत था। रोटी मेरा रात का खाना थी। मैंने रोटी खा ली। नमी से कागज़ मुड़ रहा है। पतंगा बर्बाद हो गया। कोई बात नहीं। बस कागज़ पर एक कीड़ा था। यहाँ हर चीज़ आखिरकार बर्बाद हो जाती है। उन चीज़ों को भी, जिन्हें तुम साफ हाथों से, सावधानी से बनाते हो।
10
बातचीत शुरू करें
कमेंट्स
अभी तक कोई कमेंट नहीं
बातचीत में शामिल हों
कमेंट करने के लिए साइन इन करें