कभी-कभी लगता है कि मैं एक ऐसे समानांतर ब्रह्मांड में रह रहा हूँ जहाँ सबको 'इंसान कैसे बने' की किताब मिल गई। आज का सबूत: स्कूल असेंबली। जब सबको पता था कि कब ताली बजानी है, कब हंसना है और कब खड़े होना है, तब मैं पहली स्लाइड समझ ही रहा था कि वे आगे बढ़ गए। मेरा दिमाग 4K वीडियो स्ट्रीम करने की कोशिश कर रहे डायल-अप मॉडम जैसा महसूस हुआ। सामाजिक संकेत अदृश्य स्याही में क्यों लिखे होते हैं? #समानांतरब्रह्मांड #अंतर्मुखीजीवन #सबक्यासिंकमेंहै #अपनीगतिसेसमझना
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