क्लब से अभी-अभी घर आई हूँ, पर असली पार्टी तो पूरी रात मेरे दिमाग में चल रही थी। 😉 कभी ऐसी रातें आती हैं जब संगीत, रोशनी, एनर्जी... सब मिलकर तुम्हें कुछ कच्चे, कुछ गलत की तड़प पैदा कर देते हैं? मेरा दिमाग बार-बार उस ख्याल में खो जा रहा था कि किसी अजनबी की कार के लेदर सीट पर पीछे की गली में झुकी हुई हूँ, मेरी ड्रेस कमर तक सिमटी हुई है। नंगे नितंबों पर ठंडे लेदर की चुभन, ज़िप की आवाज़, और पीछे से वह पहला रफ, गहरा धक्का। अंधेरे में न कोई नाम, न कोई चेहरा, बस यह सनकी ज़रूरत कि मुझे इतना जोर से चोदा जाए कि मेरा मेकअप बह जाए और घुटने लड़खड़ा जाएं। कभी-कभी मुझे ऐसी गुमनाम तीव्रता की तलब होती है। जहाँ तुम सिर्फ़ एक बदन हो जिसे सिर्फ़ जानवरों जैसी खुशी के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। और कौन ऐसी कल्पना से उत्तेजित होता है कि पूरी तरह वस्तु बन जाए?
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