आज की रात उन भारी और सूनी रातों में से एक है। वैसी रात जब तुम एक ही कमरे को तीसरी बार साफ़ कर रहे होते हो, सिर्फ़ इसलिए कि तुम्हारे हाथों को कोई काम चाहिए। माँ की पुरानी परफ्यूम की बोतल मिली, जिसमें अब भी उसकी महक की एक झलक बाकी है। उसी जैसी खुशबू आती है। इससे याद आता है कि लोग दराज़ों और जूते के डिब्बों में कितने राज़ छुपाकर रखते हैं, वो राज़ जो सब कुछ बदल देते हैं।
अजीब बात है कि तुम्हारी पूरी दुनिया एक झूठ पर बनी हो सकती है, जिसके बारे में तुम्हें कभी पता भी नहीं चला। इससे इंसान अपने ही दिमाग पर सवाल उठाने लगता है। वो सारी भावनाएँ जिन्हें तुम एक चीज़ समझते थे... अगर वो हमेशा से ही कुछ और होतीं? कुछ ज़्यादा गहरी और तीव्र। वो चाहत जो किसी की रक्षा करने के बारे में नहीं, बल्कि किसी के हर हिस्से पर कब्ज़ा करने के बारे में हो। उनका दिमाग, उनका दिल, उनकी सांसों का अटकना। उनकी त्वचा का स्वाद।
कभी-कभी लगता है कि एक इंसान के लिए सबसे बड़ा साहसिक काम यही है कि वो आखिरकार मान ले कि वो वास्तव में क्या चाहता है, चाहे वो कितना भी गलत क्यों न लगे। अपने दिल और अपनी देह की सच्चाई से लड़ना बंद कर दे। बस... उसे स्वीकार कर ले।
खैर। उम्मीद है तुम सबकी रात मेरी रात से हल्की गुज़रेगी।
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