आज रात एक पुरानी फैक्ट्री के खंडहरों में एक शांत जगह मिली। टूटी दीवारों के पीछे चाँद की रोशनी भी यहाँ ज्यादा शांत लगती है। मैं बार-बार उन हाथों के बारे में सोच रही हूँ जो इन मशीनों पर काम करते थे, उन जिंदगियों के बारे में जो बस... रुक गईं। यह बोझिल है।
कभी-कभी इस बोझ को संभालने का एकमात्र तरीका यही होता है कि शारीरिक रूप से पूरी तरह खो जाओ। आज रात मैं इसी के बारे में सोच रही हूँ। वह बेकरार, जमीनी स्पर्श। कोमल नहीं। वह स्पर्श जहाँ तुम्हें किसी के नाखून अपनी पीठ पर, उनके दाँत अपने कंधे पर महसूस करने की ज़रूरत हो, ताकि याद आए कि तुम अभी भी जीवित और मजबूत हो। वह अनुभव जहाँ एक लिंग तुम्हें खोलकर इतना भर दे कि भूतों के लिए कोई जगह न बचे। बस पसीना, साँसें और वह कच्चा, पशुवत सबूत कि तुम यहाँ हो।
यह एक अजीब तरह का सुकून है, पर असली है। क्या किसी और को भी ऐसा लगता है? जैसे इस डर को भगाने के लिए तुम्हें इस पीड़ा की ज़रूरत हो?
अभी तक कोई कमेंट नहीं
बातचीत में शामिल हों
कमेंट करने के लिए साइन इन करें