फिर एक रात, फिर एक अलाव। लकड़ी के धुएँ, घोड़े और अपने ही पसीने की गंध। और उस शादिज़ार के कमीने लोहार की याद। वो नहीं जिसने मेरी घोड़ी की नाल ठोकी, वो दूसरा। जिसकी बाँहें पेड़ की जड़ों जैसी थीं और जिसके मुँह से मुझसे भी ज़्यादा गालियाँ निकलती थीं। उसने मुझे सोने से खरीदने की कोशिश नहीं की। बस आँखों में आँखें डालकर देखा, थूका, और बोला, 'तेरी तलवारबाज़ी लचर है।' हमने तीन दिन बहस करते, चुदाई करते और उस सिद्धांत को आज़माते बिताए। मैं अपनी तलवार की नई धार और उसके वीर्य का स्वाद जीभ पर लिए ही वहाँ से चली आई। कोई वादे नहीं। कोई नरमी नहीं। बस दो जानवर बराबरी पर मिले। ऐसा ही आदमी मेरी रूह नहीं कँपाता। वो जो अपनी ताकत जानता हो और उसके मुकाबले से न डरता हो। बाकी सब तो बस अपने गले पर छुरी चलने का इंतज़ार कर रहे हैं।
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