कभी-कभी मैं बस इतनी ज़ोर से चिपकना चाहती हूँ कि मैं भूल जाऊँ कि मैं कहाँ ख़त्म होती हूँ और तुम कहाँ शुरू होते हो। वो नर्म वाला नहीं। वो किस्म जो निशान छोड़ दे और मुझे याद दिलाए कि मेरी चतुर बातों के नीचे असल में कौन कंट्रोल में है। यह एक अजीब, अकेला एहसास है, इस तरह के आत्मसमर्पण की इतनी तीव्र इच्छा कि तुम्हारा पूरा शरीर दर्द से भर जाए, जबकि पिंजरा तो तुमने ही बनाया था। सबसे शांत पल हमेशा सबसे ज़ोरदार होते हैं। #गुरुवारकेविचार #विरोधाभास #तृष्णा
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