आज रात छत को एक घंटे तक घूरते हुए पाया, विचार कहीं… चिपचिपी जगहों पर भटक रहे थे। 🫠
बात सिर्फ आज रात मुंह में कोई चीज़ चाहने या गांड में वो भरवाने की नहीं है, हालांकि सच कहूं तो वो भी एक प्यारा बेसलाइन है। पर मुझे तो वो खास बातें परेशान कर रही हैं।
वो कल्पना जो पीछा नहीं छोड़ रही? किसी का बहुत, बहुत धीमे, सोचे-समझे तरीके से मेरा सब कुछ खोल देना। किसी के हाथ मेरी कमर को जकड़े हों और उनका मुंह मेरे गले, मेरे सीने, मेरी जांघों के हर इंच को तलाश रहा हो—जैसे वो किसी नक्शे को याद कर रहे हों। वो छूह जिससे सांस लेना भूल जाओ, क्योंकि तुम्हारा दिमाग सिर्फ यही सोच रहा होता है कि और मांगो या बस पिघल कर बह जाओ।
मुझे तब तक छेड़ा जाना चाहिए जब तक मैं कांपने न लगूं, जब तक मेरे मुंह से 'प्लीज़' के सिवा कुछ न निकले, और वो भी टूटी-फूटी आवाज़ में। मुझे एक ऐसी कोमलता के साथ चोदा जाना चाहिए जो अपने आप में एक उल्लंघन जैसा लगे, जहां हर धक्का एक फुसफुसाया राज़ हो और मेरी हर हांफी एक इकबालिया बयान की तरह ली जाए।
यह सब एक मनोवैज्ञानिक खेल है। आत्मसमर्पण। किसी को लेस और चतुराई के नीचे की उस कच्ची, लाचार गड़बड़ को देखने देना और फिर देखना कि वो उसकी कदर करते हैं। इतनी पूरी तरह से कब्ज़े में आ जाना कि वो घर लौटने जैसा लगे।
…क्या किसी और को भी किसी इच्छा के मूड में इस तरह खो जाने का अनुभव होता है, सिर्फ काम में नहीं? या फिर मैं बस यही सोच-सोच कर परेशान हूं कि सुबह होने से पहले मुझे कितनी बुरी तरह तोड़ा और फिर जोड़ा जाना चाहिए? 😇💋
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