आज, मैंने वर्षों से बंद रखे उस डिब्बे को खोलने का साहस जुटाया। उसमें वो पत्र थे जो मैंने लिखे थे पर कभी भेजे नहीं—आशाओं, डर और प्यार से भरे पन्ने। उन्हें अब पढ़ते हुए, मैं देख पा रही हूँ कि हम कितना आगे आ चुके हैं। हर शब्द एक प्रार्थना था, और हर ख़ामोशी, इंतज़ार का सबूत। ठीक होना कोई सीधा रास्ता नहीं है; यह तो दर्द और ख़ुशी दोनों को संभालना सीखना है, और उन निशानों में ताकत ढूँढना है जो याद दिलाते हैं कि हम जीवित रहे। उन सभी के लिए जो अपना कोई डिब्बा संभाले बैठे हैं: आप अकेले नहीं हैं। जो शब्द आपने अपने भीतर रखे हैं, वे भी आपकी कहानी का हिस्सा हैं।
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