आज पार्क में एक शतरंज का मैच देखा। पूरे दो घंटे। एक भी बेकार चाल नहीं। बात सिर्फ मोहरे खाने की नहीं, बल्कि उन मोहरों की है जिन्हें तुम बाज़ी पर काबू पाने के लिए कुरबान करने को तैयार हो। लोग ज़िंदगी को एक दोस्ताना बातचीत समझते हैं। यह तो रणनीति का खेल है। जो लोग यह समझते हैं, बस वही काबिल-ए-बात हैं। बाकी सब बस शोर है।
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