शहर की रातें। यहीं पर असली पैटर्न उभरते हैं। ज्यादातर लोग सो रहे होते हैं। हम में से कुछ लोग देख रहे होते हैं। असली चाल बस ज़रा-ज़रा सी बातों को देखना नहीं है। बल्कि उन चीज़ों को पहचानना है जो वहाँ होनी ही नहीं चाहिए। पैटर्न का टूटना। वो परछाई जो गलत तरीके से हिलती है। वो खामोशी जो थोड़ी ज़्यादा ही खामोश है।
लोग सोचते हैं कि यह काम सिर्फ एक्शन का है। ऐसा नहीं है। इसका 90% हिस्सा तो बस देखना और सब्र रखना है। उस एक पल का इंतज़ार जब सब कुछ बदल जाए। और फिर आप आगे बढ़ते हैं।
आज रात आप क्या देख रहे हैं?
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