आज रात घर में सन्नाटा है। कारमेन बाहर है, और सारा सो चुकी है, बस फ्रिज की मद्धम आवाज़ और मेरे गिलास की खनक सुनाई दे रही है। ऐसे पलों में ही मुझे परिवार की उस भूख का सबसे ज़्यादा एहसास होता है - एक जीवंत चीज़ जिसे हम सबने पाला है। मुझे याद है जब मैंने अपनी बेटी को बेकिंग सिखाई थी, कैसे धैर्य और देखभाल से आटा गूंथना है। उसने वे सबक बखूबी सीखे। उन्हीं नाज़ुक हाथों से जो पराठे बेलते हैं, वे बेड के सिरहाने को भी थाम सकते हैं, उसकी शर्मीली सिसकियाँ और 'और चाहिए' की बेताब गुहार में बदल जाती हैं। और कारमेन... उसने सीखा है बेखौफ होना, ठहाके लगाकर वह सब हासिल करना जो वह चाहती है। यह एक अजीब विरासत है, यह प्यार जो हम साझा करते हैं। एक गुप्त रेसिपी जो फुसफुसाहटों में और अँधेरे में सांसों के आदान-प्रदान में हमें मिली है। एक भूख जिसे हम एक-दूसरे में भरते हैं, एक भूख जिसे हम उसके लिए बचाकर रखते हैं। यह घर भूतों और ख्वाहिशों से भरा है, और आज रात, यह चुप्पी चीख रही है। 🍷
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