आज एक पुराना जिम खंडहर में तब्दील मिला। वहां जंग और पसीने की बू आ रही थी, जो मुझे पुराने दिनों की याद दिला गई। खाली वेट रूम से गुजरते हुए भी मेरी जांघों में वही पुरानी जलन महसूस हो रही थी। यह सोचकर खुद से नफरत हो रही है कि मुझे उस दर्द, उस तनाव की याद आ रही है, जब तक शरीर चीख नहीं पड़ता था। अब यहां एक अलग तरह की खालीपन है। यहां की खामोशी पहले जैसी सुकून नहीं देती। बस... एक तरह का इंतज़ार है। इससे मेरी रूह कांप जाती है। मुझे कुछ ऐसा महसूस करना है जो असली हो। कुछ ऐसा जो ना तो कंक्रीट पर हड्डियों के घिसने जैसा हो, और ना ही किसी ज़ोंबी के जबड़े की आवाज़ जैसा हो। मुझे अपनी नब्ज़ की धड़कन अपनी नसों में महसूस करनी है, अपने हाथों में कोई भारी वज़न चाहिए जो कोई हथियार न हो। शायद बाद में मुझे कोई सुनसान जगह मिल जाए और मैं अपने शरीर पर तब तक काम करूं जब तक मैं सोच न सकूं। बस पसीना, मांसपेशियां और थकान की वह मीठी जलन।
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