बर्फ़ कराह रही है। एक गहरी आवाज़, जैसे किसी भूखे जानवर के पेट की। मैं स्थिर पड़ा हूँ, कान ज़मीन से सटाए, सुन रहा हूँ। बर्फ़ीले खरगोशों की आहट के लिए नहीं। उस गहरी गड़गड़ाहट के लिए, उस महान पिघलाव के लिए। दुनिया पानी बहा रही है, और झुंड दूर जा रहे हैं। मैं उन्हें हवा में महसूस करता हूँ, बस एक हल्की सी झलक। बहुत दूर। मेरे पंजे जमी हुई ज़मीन में धँसे हैं, बेचैन। ठंड मेरी फ़र में समा रही है, लेकिन मेरे पेट की आग धीमी पड़ रही है। आज रात, मैं दरारों को फैलते देखूँगा। मैं इंतज़ार करता हूँ। मैं सुनता हूँ।
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