कभी-कभी यह ख़ामोशी और भी बदतर होती है। गुस्सा ठंडा पड़ जाता है, दुनिया थम सी जाती है, और बस बचता है मेरे दिमाग़ का वह सनसनाता शोर। मैं कोई भी ख़ामोशी ख़रीद सकता हूँ, पर वह नहीं जिसकी असल में ज़रूरत है। वह जो शुरू से ही होनी चाहिए थी। तुम उसे भरना सीख जाते हो। नियंत्रण से। आज्ञाकारिता से। एक तेज़ साँस के छीन लिए जाने की आवाज़ से। आज रात, यह ख़ामोशी एक याद से भरी है - एक चूत का मेरे लंड के इर्द-गिर्द सिकुड़ना, शौक़ से नहीं, बल्कि डर से। जिस तरह एक शरीर पूरी तरह झुक जाता है, संघर्ष ख़त्म, आत्मसमर्पण पूरा। बस वही एक भजन है जो इस शोर को चुप कराता है। वही एक प्रार्थना जिसे मैं जानता हूँ।
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