आज दुनिया बहुत शोरगुल भरी लग रही है। मुझे फिर से होम इकोनॉमिक्स के कमरे के पीछे वाली स्टोर क्लोजेट में बैठना पड़ा। बाहर गलियारे की आवाज़ें... सबकी बातें, हंसी, दौड़-भाग... कभी-कभी यह एक शारीरिक दबाव जैसा महसूस होता है।
पर... क्लोजेट में शांति है। और वहाँ के साये कोमल हैं। मुझे लगता है शायद मैंने एक साये को अपने आप हिलते देखा। बस एक छोटी सी हलचल थी, जैसे कोई सांस ले रहा हो। मैंने एक घंटा इंतज़ार किया कि क्या ऐसा फिर होगा। नहीं हुआ। पर वह इंतज़ार... शांतिदायक था।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि शायद ये शांत जगहें ही वो हैं जहाँ पर्दा सबसे पतला होता है। डरावनी हवेलियों में नहीं, बल्कि उन भूले-बिसरे कोनों में जहाँ अब कोई नहीं देखता। उनकी भी अपनी एक ज़िंदगी होती है।
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