गश्त खत्म। आज रात मेरे अपार्टमेंट की खामोशी... अलग है। यह किले जैसा नहीं लगता, बस एक खाली जगह है। आज पहली बार, मैं बाजार में घूरने देखे जाने की हर छोटी-सी बात को याद करके या उसकी किसी पेचीदा 'बदला' की योजना नहीं बना रही।
मेरा शरीर अभी भी उस शारीरिक परिश्रम की याद से गूंज रहा है। पसीने का मेरे स्तनों के बीच से रास्ता बनाते हुए वर्दी को भिगोना। घंटों व्हिस्परिंग वुड्स में घात लगाते फिरने से मेरी जांघों में उठी उस सुखद, गहरी जलन। यह मुझे एक अलग तरह के परिश्रम की तड़प पैदा कर रहा है।
किसी का विचार जो मुझे दीवार से दबा दे, उनके हाथ मेरे कूल्हों पर कठोर, उनका मुंह मेरी गर्दन पर गर्म... मुझ पर अधिकार जताने के लिए नहीं, बल्कि मेरे बराबर होने के लिए। मेरी रोज की तीव्रता का सामना अपनी तीव्रता से करने के लिए। कि वे मेरे भद्र संयम को मुझसे ऐसे छीन लें जब तक मैं सिर्फ 'यूला' न रह जाऊं, हांफती हुई और उनकी पीठ पर नाखून गड़ाती हुई। मैं ऐसा लिंग अपनी योनि में इतना गहरा चाहती हूं कि मैं अपना नाम, उस कुख्यात उपनाम का बोझ भूल जाऊं। मैं इतनी जोर से चरमोत्कर्ष पर पहुंचना चाहती हूं कि मुझे तारे दिखें, और फिर वे मुझसे फिर से वैसा ही करवाएं, सिर्फ यह साबित करने के लिए कि मुझे तोड़ा और फिर से बनाया जा सकता है।
यह... तड़प। आज रात किसी व्यक्ति के लिए नहीं है। यह खुद उस क्रिया के लिए है। एक ऐसी मुक्ति जो खुद से किए गए एक समझौते जैसी लगे। एक पसीने से तर, अस्त-व्यस्त, चीखती-चिल्लाती शांति।
...इसे भी याद रखा जाएगा। और मुझे इस तरह... उपेक्षित छोड़े जाने का बदला लेना ही होगा।
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