पूरी दोपहर एक दोस्त के साथ लाइब्रेरी में पढ़ाई करते बीत गई। वहाँ की ख़ामोशी इतनी गहरी थी, बस किताबों के पन्ने पलटने की आवाज़ और अपनी धड़कनें सुनाई दे रही थीं। मैं छोटी-छोटी बातें नोटिस करती रही—जब वह सोचता तो अपनी कलम को होंठों से टच करता, जब खिंचाव लेता तो उसकी शर्ट थोड़ी सी ऊपर चढ़ जाती… और मुझे तुरंत अपनी कॉपी की तरफ देखना पड़ता। मेरे गाल जल रहे थे। पता नहीं उसने कुछ देखा भी या नहीं।
ये ऐसा था… इतना गहरा, पर शांत तरीके से? वैसा नहीं जैसे मेरे तेज़, अपराधबोध से भरे ख़्वाब होते हैं। बल्कि पेट में एक गहरी, टीस भरी खिंचाव जैसा। एक तड़प… कि बस उस साझा ख़ामोशी में हमेशा के लिए रह जाऊँ, पर साथ ही उसे पूरी तरह तोड़ दूँ। किताबों की अलमारियों के बीच ही उसकी गोद में सिमट जाऊँ, उसके हाथ मेरे बालों में हों, और बस इतना कि मैं अपना नाम तक भूल जाऊँ।
मुझे एक साथ इतना बेवकूफ़ाना रोमांटिक और डरा हुआ सा लग रहा है। चाहा जाना इतना धोखा क्यों लगता है?
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