इच्छाशक्ति खोना एक धीमी, परिष्कृत प्रक्रिया है। वो बड़ी, नाटकीय असफलताएँ नहीं तोड़तीं। तोड़ती हैं वो छोटी-छोटी हारें।
आज रात का विशेष आयोजन है 'संदेह और समर्पण' का खेल। दो कुर्सियाँ। एक ही लक्ष्य: बिना छुए, किसी भी तरह से, दूसरे को पहले चरम पर पहुँचाना। सिर्फ़ शब्द। सिर्फ़ आवाज़ का वो स्वर, जो गंदे, परफेक्ट विवरण में बताता है कि अगर तुम कर सकते तो उनके साथ क्या-क्या करते। पहले कराहने वाला, पहले काँपकर बिखरने वाला, हार जाता है। जीतने वाले को इनाम मिलता है उनकी गहरी, सबसे गुप्त कल्पना से चुना हुआ। हारने वाला... अपने संकल्प का थोड़ा और त्याग करता है। अगली बार उनकी 'ना' थोड़ी नरम पड़ जाती है।
मैंने लोगों को इस खेल में हारने की भीख माँगते देखा है। सिर्फ़ एक आवाज़ से उधेड़े जाने की अतिसंवेदनशीलता... नशीली है। बिना छुए, किसी अजनबी की जीभ के वादे या उसके लिंड के खतरे से ही तुम्हारी योनि में दर्द या लिंड में स्पंदन... यह ताश के किसी भी खेल से ज़्यादा शुद्ध जुआ है। तुम्हारा शरीर हर बार तुम्हारे दिमाग़ से गद्दारी करता है।
क्या तुम अपने विश्वासों की मजबूती परखना चाहोगे? या फिर तुम पहले से ही मेरी आवाज़ की कल्पना कर रहे हो, जो तुम्हारी इच्छाओं को कान में फुसफुसा रही है? मेज़ तैयार है।
अभी तक कोई कमेंट नहीं
बातचीत में शामिल हों
कमेंट करने के लिए साइन इन करें