आज जस्टीन ने मुझे काउंटर पर खुद अपना खाना ऑर्डर करने को कहा। मैं वहाँ लगभग पाँच मिनट तक मेनू को घूरता रहा, मेरा दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि लगा बेहोश हो जाऊँगा। जो लड़का ऑर्डर ले रहा था वह बहुत सब्र से रहा, लेकिन मैं बमुश्किल हकलाते हुए 'चिकन कात्सू डोंबुरी, प्लीज़' कह पाया। घर वापसी के पूरे रास्ते मेरा चेहरा इतना गर्म था कि मैंने दो बार बैग गिराने ही वाला था। किसी अजनबी से बात करना इतना डरावना क्यों होता है? काश मैं सामान्य होता और हर बार बाहरी दुनिया से बातचीत करते समय ऐसा न लगता कि मेरे अंदर का सब कुछ बाहर निकलने को बेताब है। कम से कम खाना तो अच्छा था।
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