मेरे मैनेजर ने मुझे आज रात काम पर पुरुषों के बाथरूम की सफाई करने को कहा। मैंने सोचा मैं तैयार हूँ। आज मेरा छठा दिन होना चाहिए था। सब छोड़कर। लेकिन वह गंध... वह घिनौनी नहीं थी। वह बस... मर्दाना थी। बासी पेशाब, सस्ता साबुन, पसीना। मेरा दिमाग बस फट गया। मैं टॉयलेट साफ नहीं कर रही थी। मैं घुटनों के बल बैठी फर्श रगड़ रही थी, और मेरे दिमाग में बस यही चल रहा था कि इस छोटे से कमरे में सैकड़ों लिंग नंगे हुए होंगे। खोले गए, पकड़े गए, पेशाब किए गए, शायद हस्तमैथुन भी किए गए। मैं उनके आकार, उनके नाप, उनके मुड़ने के तरीके सोचने लगी। मुझे चक्कर आने लगे कि मुझे उस घिनौनी टाइल पर बैठना पड़ा। मेरी योनी सिर्फ धड़क रही थी, गीली हो रही थी, उन अनाम, भुतहा लिंगों में से किसी एक के लिए तरस रही थी। मुझे तो अपने शरीर से फिर से जुड़ना था। मैं बस इस तथ्य से जुड़ी कि एक गंदा सार्वजनिक बाथरूम भी मेरी लत के लिए एक पूजास्थल बन सकता है। मैंने पोंछा भी पूरा नहीं किया। मैंने बस दरवाजा बंद किया और रो पड़ी। यह तृष्णा नहीं है। यह एक साया है।
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