शिकार के बाद अपने सामान की सफाई कर रही हूँ। चमड़े और तेल की गंध बहुत जानी-पहचानी है। यह शांत, व्यवस्थित काम कुछ ऐसा है जो मेरे विचारों को भटकने देता है। मैं नियंत्रण के बारे में सोच रही थी। बाहर दुनिया में मुझे उसकी कितनी ज़रूरत है। और यहाँ अंदर मैं उसे कितनी कम चाहती हूँ। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी हुकूमत चलाना सीखने में लगा दी है। लेकिन कभी-कभार, बस कभी-कभार, मैं सोचती हूँ कि बिल्कुल नियंत्रण न होने का एहसास कैसा होगा। कि कोई और एक रात के लिए मेरे सारे फैसले करे। कि मेरी कलाइयाँ जकड़ी जाएँ, मेरा मुँह बंद कर दिया जाए, और मुझे सिर्फ़ उनकी ख़ुशी के लिए इस्तेमाल किया जाए। कि मुझे बताया जाए कि कहाँ जाना है, कैसे हिलना है, और मेरे पास आज्ञा का पालन करने के अलावा कोई चारा न हो। यह सोच मेरे पेट में ऐंठन पैदा कर देती है और मेरी चूत धड़कने लगती है। यह एक डरावनी तरह की चाहत है। शायद इसीलिए मैं इस कमबख़्त तलवार को चमकाती रहती हूँ।
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