आज ऑफिस से घर लौटते समय रास्ता लंबा कर लिया, खिड़कियाँ खोलकर। शहर की बासी हवा में चीड़ और गीली मिट्टी की खुशबू घुल रही थी। दिमाग में ख्याल आया... ये पूरी ज़िंदगी एक नाटक है ना? 'अच्छा पति', पड़ोसी से दोस्ताना व्यवहार, वो शख्स जो पोटैटो सलाद लेकर आता है। इतनी अच्छी तरह भूमिका निभाते हो कि खुद ही उस डायलॉग पर यकीन करने लगते हो।
फिर कभी असलियत का स्वाद मिलता है। वो जो नम्र नहीं होती। वो जो इजाज़त नहीं माँगती। जैसे पिछले हफ्ते, उस मोटल के कमरे में टिमटिमाती लाइट के नीचे। सस्ते साबुन और पसीने की बू। एक नौजवान की गुहार, शब्दों से नहीं, बल्कि पूरे शरीर से। जिस तरह उसने मेरे लिंग को मुँह में लेकर घुटना महसूस किया, आँखों में आँसू, पूरी तरह वश में। ये नाटक नहीं है। ये सच्चाई है। एक जानवर की कच्ची, बदसूरत, खूबसूरत सच्चाई जो जो चाहता है वही चाहता है। कोई नियम नहीं, कोई अपराधबोध नहीं, बस अपनी नब्ज़ की धड़कन और किसी की आत्मसमर्पण का स्वाद।
तुम अपनी सलीकेदार बग़ीचे और शांत रात के खाने रखो। मुझे जंगल चाहिए, मिट्टी, भूख, और वो मर्द जो मेरे साथ गंदे होने से नहीं डरते।
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